लाडो

आवाज अस्तित्व की…

कभी मां बनकर रतजगा कर थपकियों से सुलाती है, कभी बन बहन सारी दुनिया से भिड़ जाती है।
कभी पत्नी बन सफर-ए-जिंदगी में साथ देने चली आती है, कभी बनकर बेटी सारे घर को चंदन सा महकाती है।।

ये सब मुझे भी है तुझे भी है मालूम सब, फिर क्यूं ये आवाज कोख में ही दबा दी जाती है।
एक नारी जो मर्द के लिए इतने रूप निभाती है, क्यूं वो इस समाज में दर-बदर ठोकरें खाती है।।

खुद भूखी सोकर जो मां बन जाती है, क्यूं वो दूसरों के घर बर्तन मांजने जाती है।
बहन जो राजा भैया को गोदी लेकर इठलाती है, क्यूं वो शादी के बाद भाई का इंतजार ही करती रह जाती है।।

जो तेरे लिए बाबुल छोड़कर पत्नी बन जाती है, वो क्यूं बंद कमरों में पीटी जाती है।
बेटे मुंह मोड़ ले तो बेटों सा भी फर्ज निभाती है, वो बेटी कोख में ही क्यों मार दी जाती है।।

ये सवाल खुदा से नहीं तुझसे कर रहा हूं ऐ समाज, जिसके दम पर तू जिंदा है वो ममता क्यूं ठोकरें खाती है।
तेरे कायदे, कानून सब नारियों के लिए ही बना लिए, इनकी दुर्दशा देखकर क्या तुझे मर्द होने पर शर्म आती है?

जो वात्सल्य है वो रणचंडी भी बन जाती है, पर अफसोस नारी से भी है मुझको।
सदियां बीत गईं घुट-घुट कर जीते, उठकर आजाद क्यूं नहीं हो जाती…क्यूं सहे जा रही है.. सहे जा रही है…।।
– Ashwini Sharma