Help Child Widows for their better future

बाल विवाह ने जन्म दिया बाल विधवाओं को दुनिया और घर-गृहस्थी की समझ आने की उम्र में कोई नारी विधवा होती है तो सामाजिक रूढि़वादिता उसकी जीवन शैली ही बदल देती है। उस पर अनेक पाबंदियां लगा दी जाती हैं। एक तरह से उससे जीवन जीने का हक छीन लिया जाता है। पर जब विधवा बनने के लिए छोटी सी एक बच्ची को मजबूर किया जाए तो क्या समाज की यह कू्ररता नहीं कही जाएगी? जिस बच्ची में किसी तरह की समझ नहीं होती, उसे सिर्फ खेलना, हंसना-खिलखिलाना भाता हो, मां की गोद की वह आदी हो और पिता के दुलार को ही सबकुछ समझती हो, उसी मासूम को विधवा का चोला पहना दिया जाए, तो समाज के इस अन्याय की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। इस कल्पना को साकार रूप से देखना हम जैसे सभ्य लोगों के बूते की बात नहीं है। उस पर भी विडंबना यह कि इन बाल विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं किया जाता, बल्कि इन्हें किसी भी उम्र के विधुर पुरुष या विवाहित एकल पुरुष के साथ नाता रख दिया जाता है। नाता रखने के बाद भी इनके जीवन में कोई सुधार नहीं आता बल्कि ये सब उन पुरुषों की पूर्व पत्नियों के बच्चों का लालन-पालन करते हुए अपनी जिंदगी का बोझ ही ढो रही होती हैं। गरीबी से उपजी पुरातन परंपराओं ने बाल विवाहों का प्रचलन बढ़ाया और बाल विवाहों ने बड़े पैमाने पर बाल विधवाओं को जन्म दिया है। रेगिस्तानी प्रदेश के गांवों में हजारों विधवाएं बदकिस्मती का बोझ कंधे पर उठाए अनाम-सी जिंदगी जी रही हैं|

क्या करेगी लाडो सोसायटी?

लाडो सोसायटी ने अखबारों और न्यूज मैगजीन में आने वाली महिलाओं की समस्याओं से संबंधित खबरों पर ध्यान दिया। पिछले कई वर्षों से लाडो सोसायटी इस तरह की खबरों का संकलन कर रही है। प्रदेश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां महिलाएं त्रस्त नहीं हों। हर क्षेत्र विशेष में अलग-अलग तरह की समस्याएं, कुरीतियां और कुप्रथाएं हैं। और विचार करने की बात यह है कि अधिकतर समस्याएं महिलाओं और बच्चों से ही ताल्लुक रखती हैं। प्रदेश भर में बिखरी महिलाओं और बच्चों की समस्याओं के बारे में जानकारी देने में इंडिया टुडे मैगजीन ने लाडो को बहुत सहयोग किया है। इसी में पढ़कर लाडो सोसायटी ने महिलाओं की सभी समस्याओं को दूर करने का बीड़ा उठाया है। इसी क्रम में लाडो सोसायटी ने सबसे पहले बाल विधवाओं की समस्या को उजागर करने का प्रयास किया है और बच्चियों को बाल विधवा होने से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस संकल्प का नाम दिया गया है – न होंगे बाल विवाह, न होगी कोई बाल विधवा। इस मिशन को पूरा करने के लिए लाडो सोसायटी का प्रयास अनवरत जारी रहेगा।

बाल विधवाओं का मसला इससे पहले संभवतः किसी ने नहीं उठाया और न ही बाल विधवाओं की स्थितियों को सुधारने की पहल की गई है। लाडो ही एकमात्र ऐसी गैर सरकारी संस्था है, जिसने पहली बार राज्य की बाल विधवाओं की करूण गाथा को सबके सामने प्रदर्शित किया है। जो बच्चियां बाल विधवा होने का दंश झेल रही हैं, उन्हें शिक्षित करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए लाडो प्रतिबद्ध है। इसके लिए लाडो सोसायटी ने सर्वप्रथम अजमेर और भीलवाड़ा जिलों को चुना है, जहां यह संस्था काम करेगी। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए लाडो ने अपने इस संकल्प की ब्रांड एंबेसडर सुमन तैली को चुना है। सुमन की पूरी पढ़ाई होने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने तक का खर्च लाडो उठाएगी। सुमन को गोद लेकर लाडो ने अपने संकल्प की शुरुआत की है। इसके अतिरिक्त यदि सुमन का परिवार नाता प्रथा जैसी कुप्रथा को बंद करवाने के पक्ष में लाडो का सहयोग करेगा तो लाडो की ओर से सुमन का पुनर्विवाह धूमधाम से कराया जाएगा। लाडो की यह भी कोशिश रहेगी कि राजस्थान के ग्रामीण समाज से नाता प्रथा जैसी कुप्रथा पर भी कानूनी तौर पर पाबंदी लग जाए। इसके अलावा लाडो सोसायटी पूरे राजस्थान प्रदेश के हर जिले में बाल विधवाओं की वास्तविक संख्या और उनकी स्थितियों पर सर्वे करेगी और राजस्थान सरकार के सामने प्रस्तुत करेगी।

बाल विधवाओं की मदद के लिए इस राज्य और देश के प्रबुदृध नागरिकों से मदद का अनुरोध है। तन, मन और धन किसी भी प्रकर से आप संस्था की मदद कर सकते हैं।

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